अर्पण बी. खरवा, शोध छात्र, वस्त्र इंजीनियरिंग

बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन: मेडिकल टेक्सटाइल्स में नई क्रांति

बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन में नई खोजों ने मासिक धर्म स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को बदल दिया है। पारंपरिक पैड, जो प्लास्टिक और सिंथेटिक सामग्री से बने होते हैं, सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होते और कचरे की समस्या को बढ़ाते हैं। इसके विपरीत, बांस, केले के रेशे, कॉर्न स्टार्च और ऑर्गेनिक कॉटन से बने बायोडिग्रेडेबल नैपकिन कुछ महीनों में ही नष्ट हो जाते हैं, जिससे पर्यावरण पर प्रभाव कम होता है।

ये इको-फ्रेंडली पैड हानिकारक रसायनों से मुक्त होते हैं, जिससे एलर्जी, खुजली और संक्रमण का खतरा कम होता है। कुछ ब्रांड पौधों से मिलने वाले एंटीबैक्टीरियल तत्वों को भी मिला रहे हैं, जिससे सफाई और सुरक्षा बढ़ाई जा सके।

हालांकि, इनकी कीमत ज्यादा होने के कारण सभी के लिए खरीदना आसान नहीं है। लेकिन बढ़ती जागरूकता, सरकारी सहयोग और नई तकनीकों से यह बदलाव संभव हो सकता है। कई स्टार्टअप और एनजीओ ग्रामीण महिलाओं को इन नैपकिनों के निर्माण और बिक्री के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं, जिससे यह सस्ते और सुलभ हो रहे हैं।

नए नवाचार और शोध

द इंटरव्यू वर्ल्ड से खास बातचीत में, टेक्सटाइल इंजीनियरिंग शोधकर्ता अर्पण बी. खरवा ने अपने मेडिकल टेक्सटाइल इनोवेशन और बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन पर चर्चा की। उन्होंने कच्चे माल के आयात को कम करने, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और नवीनतम शोध पर अपने विचार साझा किए।

Q: आपने मेडिकल टेक्सटाइल्स में कौन-कौन से इनोवेशन किए हैं?

A: मैं बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन पर रिसर्च कर रहा हूँ और छोटे स्तर पर इनका निर्माण भी कर रहा हूँ। ये नैपकिन सिर्फ 136 दिनों में पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। इन रसायन-मुक्त नैपकिन से एलर्जी और संक्रमण का खतरा नहीं होता। साथ ही, ये सस्ते और अधिक टिकाऊ हैं, जिससे ज्यादा लोग इन्हें खरीद सकें।

Q: बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन का बाजार कैसा है और यह पर्यावरण के लिए कैसे फायदेमंद हैं?

A: भारत 95% सिल्क वेस्ट (रेशम का कचरा) चीन को निर्यात करता है। हम इसे भारत में ही उपयोग करके सैनिटरी नैपकिन बनाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे आयात पर निर्भरता घटेगी और पर्यावरण को भी फायदा होगा

Q: हम सैनिटरी नैपकिन के लिए कच्चे माल के आयात पर निर्भरता कैसे कम कर सकते हैं?

A: भारत से सिल्क वेस्ट ₹200 प्रति किलो में निर्यात किया जाता है, जबकि चीन इसे प्रोसेस करके ₹1,200 प्रति किलो में हमें वापस बेचता है। यदि हम भारत में ही प्रोसेसिंग यूनिट लगाएँ, तो यह लागत काफी कम हो सकती है और आत्मनिर्भरता बढ़ेगी

Q: आप वर्तमान में कौन से इनोवेशन पर काम कर रहे हैं?

A: हमारे पास बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन हैं, लेकिन समस्या उन्हें सही तरीके से इस्तेमाल करने की है। सैनिटरी नैपकिन का उत्पादन हर दिन लाखों की संख्या में होता है, इसलिए हमें ऐसे बायोडिग्रेडेबल कच्चे माल बनाने होंगे जो किफायती और बड़े पैमाने पर बनाए जा सकें। शोध और नई तकनीकों के जरिए हम भारत को टिकाऊ स्वच्छता उत्पादों का वैश्विक नेता बना सकते हैं

निष्कर्ष

बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद हैं। यदि नई तकनीकों, सरकारी सहयोग और जागरूकता को बढ़ावा दिया जाए, तो यह विकल्प हर महिला के लिए सुलभ और सस्ता हो सकता है। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण होगा, बल्कि मासिक धर्म स्वच्छता में भी एक नई क्रांति आएगी। 🌱

मेडिकल टेक्सटाइल में पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में अग्रसर – बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन में बढ़ते नवाचार
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